|| ख्यालों में यादें ||
होंगे कोई और जो ज़ुल्फ़ों को घटा
कहते,
हम तो इनको ज़ंजीर-ए-वफ़ा ही कहते।
हम तेरे साथ होते तो बेहतर इंसां होते।
कामयाब होते, मसरूफ़ भी रहते लेकिन,
तेरे पहलू में होते तो ज़िंदा भी होते।
तेरी सूरत जो बस जाती निगाह-ए-शौक़ में,
हमारी शब भी रोज़ ढलती, रोज़ सवेरे होते।
ख़ूबसूरत हो, जवाँ हो, दिलकश भी हो तुम,
मगर होते जो हमारे साथ तो रंग कुछ और होते।
कोई शिकवा नहीं, शिकायत भी नहीं तुझसे,
बस ये है कि हम तेरे होते तो आलम कुछ और होते।
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