Tuesday, August 19, 2008
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इन दिनों जब कुछ नहीं हैं!
मुझसे कुछ भी नहीं हो पाया जैसे सब कुछ होते हुए भी कुछ हाथ नहीं आया। बड़ी गहराइयों से देखे तो बड़ा ज्ञान रहा, दोस्त थे, शहर था, सब कुछ ठीक ...
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`और क्या..` फिर मौन.. शब्द गले में अटके। उन भावों को गला स्वर भी नहीं दे पाता। चुप में सबकुछ था, जो शब्द में कहीं नहीं था। फिर जैसे शब्दों ...
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मुझसे कुछ भी नहीं हो पाया जैसे सब कुछ होते हुए भी कुछ हाथ नहीं आया। बड़ी गहराइयों से देखे तो बड़ा ज्ञान रहा, दोस्त थे, शहर था, सब कुछ ठीक ...
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इस समय कैसे प्रतिक्रिया दूँ, मैं क्या चाहता हूँ, मैं क्यों उदास हूँ, इसलिए की वे अब फिर साथ रहेंगे या इसलिए की उसे नई तकलीफें होगी, उसे अपने...